बच्चों से कहें सिर्फ ये छोटी सी बात, कभी नहीं भूलेंगे अपने संस्कार

आज की व्यस्त जीवनशैली और माता-पिता दोनों के कामकाजी होने के कारण माता-पिता अपने बच्चों को ज्यादा समय नहीं दे पाते हैं।

Rashmi Upadhyay
Written by: Rashmi UpadhyayUpdated at: Nov 08, 2023 13:00 IST
बच्चों से कहें सिर्फ ये छोटी सी बात, कभी नहीं भूलेंगे अपने संस्कार

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आज की व्यस्त जीवनशैली और माता-पिता दोनों के कामकाजी होने के कारण माता-पिता अपने बच्चों को ज्यादा समय नहीं दे पाते हैं। इस संदर्भ में मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि यह सच है कि अधिकतर बच्चों की यह इच्छा रहती है कि उनके माता-पिता उन्हें अधिक से अधिक वक्त दें, लेकिन व्यस्त जीवनशैली के चलते यह संभव नहीं हो पाता। ऐसे में जरूरी है कि माता-पिता बच्चों को ज्यादा समय देने के बजाय इस पर ध्यान दें कि उन्हें अपने बच्चों को क्वालिटी टाइम देना है। बच्चों के साथ क्वालिटी टाइम बिताना बहुत जरूरी है। इससे बच्चों को यह अहसास होता है कि आप उनकी कितनी केयर करते हैं।

बताएं रीति-रिवाजों को

अगर हमारी जिंदगी में त्योहार न शामिल होते तो हमारा सामाजिक जीवन कितना नीरस होता। त्योहारों के बहाने से ही रिश्तेदारों, मित्रों और परिचितों से हमारा मिलना-जुलना हो पाता है। त्योहारों की वजह से ही हमारी कई परंपराएं जीवित हैं जैसे बड़ों के पैर छूकर आशीर्वाद लेना और एक-दूसरे को उपहार देना आदि। त्योहार के मौके पर रिश्तेदारों या दोस्तों के यहां जाने के दौरान अपने साथ बच्चों को भी साथ ले जाएं। जब भी कोई त्योहार आने वाला हो तो पहले से ही बच्चे को उसके बारे में बताना शुरू कर दें और अपनी बातों से ही घर में त्योहार का माहौल बना दें। शॉपिंग से लेकर सजावट तक की तैयारियों में बच्चों को

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प्रताडऩा ठीक नहीं

बहुत से लोगों की आदत होती है कि वे अपने बच्चों को अनुशासन में रखने के लिए उन्हें प्रताडि़त करने लगते हैं अर्थात वे मारपीट पर यकीन करने लगते हैं। बाल मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि अगर आप चाहते हैं कि बच्चे आपकी बातों पर गंभीरतापूर्वक ध्यान दें तो बच्चों को प्रताडि़त न करें। उन्हें मारने-पीटने के बजाय यह समझाएं कि उनसे गलती कहां हुई और वे किस तरह उस गलती को सुधार सकते हैं। इससे अगली बार आपका बच्चा कोई गलती करने से पहले कई बार सोचेगा और वह जान-बूझकर कोई गलती नहीं करेगा।

सराहना में है शक्ति

बहुत से माता-पिता की आदत होती है कि वे दूसरे के बच्चों से अपने बच्चे की तुलना करने लगते हैं। बाल मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि कभी भी किसी बच्चे की किसी अन्य बच्चे से तुलना न करें। हर बच्चा अपने आप में यूनीक होता है अर्थात उसमें कोई न कोई खूबी जरूर होती है। यह और बात है कि कई बार वह समय पर हमें पता नहीं चल पाती। इसलिए दूसरे बच्चों के सामने अपने बच्चे की कभी भी आलोचना न करें। दूसरों के सामने आलोचना करने से बालमन पर बुरा प्रभाव पड़ता है और उसका मनोबल गिरता है।

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परामर्श करें

यदि आप बच्चों की परवरिश के संदर्भ में खुद को अक्षम महसूस कर रही हैं तो परिवार के बुजुर्ग लोगों की सहायता लें। उनके पास अनुभव का भंडार होता है। आप चाहें तो किसी चाइल्ड काउंसलर से भी परामर्श कर सकती हैं। इससे आपको बच्चों की परवरिश के संदर्भ में परेशान नहीं होना पड़ेगा।

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